Thursday, July 20, 2017

अनाम रिश्ते

रिश्ते कुछ अनाम अभी बाक़ी हैं

काँटो में भी रह

गुलाब की तरह खिलने की चाह अभी बाकी हैं

फ़रियाद महक से इसकी भी वही आती हैं

रंग जब अपने रिश्तों का जुदा नहीं

अड़चन फ़िर  कहा

मुझको अंगीकार करने में आती हैं

कहीं खुदगर्जी का आलम

कहीं ज़माने का डर

फ़िर भी जीवन डोर में पिरोने

कुछ अनाम रिश्ते अभी बाकी हैं

कुछ अनाम रिश्ते अभी बाकी हैं

Saturday, July 8, 2017

रुख

कह दो हवाओं से

रुख बदल ले जरा

हिज़ाब उनका सरका ले जाए जरा

हुस्न जो कैद हैं इसके पीछे

आज़ाद हो जाए नक़ाब से जरा

छिपा महफ़ूज रखा जिसे

दीदार से उसके हो जाए जरा

कह दो हवाओं से

रुख बदल ले जरा




Friday, July 7, 2017

ख़ामोशी

ख़फ़ा ना होना ए ख़ामोशी तू कभी

रिश्ते सारे झूठे

एक तुझ पे ही बस ऐतबार हैं

गुफ्तगूँ तुमसे मैं कर सकूँ

दर्द मेरा तू समझ सके

लफ्ज मौन ही सही

पर रक्तरंजित ह्रदय तो खोल सकूँ

इस दर्द की दीवानगी

सिवा तेरे कोई समझ ना पायेगा

लबों पे अब लफ्ज़ सजाऊ कैसे

अल्फाज जो कल मेरे अपने थे

आज वो रूठे रूठे बेगाने से हैं

राजदार तुम ही हो इस सफ़र की

हमसफ़र बन चलते रहना

बस एक तू ही वफ़ा की ताबीर हैं

बाक़ी सब तो सिर्फ़ एक कहानी हैं

रिश्ते सारे झूठे

बस एक सच्ची तेरी यारी हैं

Saturday, June 24, 2017

वाकिफ़

दुनिया कहती है तू निराकार हैं

पर मैं कहता हूँ मेरा हृदय ही तेरा आकार हैं

अहंकार नहीं यह जज्बात हैं

क्योंकि इसकी धड़कनों में

तेरी ही रूह का बास हैं

आत्मा से परमात्मा के मिलन का

यही एक सच्चा मार्ग हैं

ना मैं तपस्वी हूँ

ना ही मैं दानी हूँ

फिर भी संयम बल से ज्ञानी हूँ

इसीलिये

विधमान हैं तू इस दिल में

इस ज्ञान से मैं भी वाकिफ़ हूँ







Sunday, June 11, 2017

सात फेरे

मुस्कान ने उनकी कहर बरपा दिया

दिल की इस नाजुक जमीं पर

वज्रपात का कोहराम मचा दिया

आघात गहरा इतना था

सहम गया पूरा तन बदन

सदमा झेल ना पाया ए मन

ओर हो गया इसका चीरहरण

दिल भी यह कहां उनसे कम था

कम्बख्त ने बना लिया

उनकी हसीं को ही अपना हमसफ़र

बाँध लिया बंधन में उनको

फिर सात फेरों के संग

सात फेरों के संग

दो जाम

पिला दिए उन्होंने आँखों के जब दो जाम

हो गयी मदहोश रूह की चाल

फ़ना हो गया साया भी ख़ास

मटकायें उन्होंने जब नयनों के ताव

चढ़ गया सुरूर नशे का

पेंच लड़ गए जब उनके कजरों के साथ

ऐसी बरस रही मदिरा उनके नजरों के साथ

पीछे छूट गयी जिन्ने मधुशाल की हर बार

पैमाने छलक रहे अब इस दिल के

उनके नयनों के मयखानों के साथ

उनके नयनों के मयखानों के साथ

Tuesday, June 6, 2017

इंतजार

वेदना अपनी बयाँ ना कर पाया

किताब के पन्नों पे इसे उकेर ना पाया 

रोशनी चुरा ले गया कोई काफ़िर हमारी

भटका गया मंजिल से राह हमारी 

पाना जिस मंजिल को कभी हसरतें थी हमारी 

कशिश अधूरी रह गयी थी वो हमारी 

आलम अब तो बस बेबसी का संग था 

रूह जलाने को

यादों का अग्नि कुंड पास था

ना दरियां में अब वो तूफां था

ना हवाओँ में वो आगाज़ था

सुन ठहर जाती थी मंजिल जिसे कभी

अफसानों का वो तिल्सिमि पिटारा अब पास ना था 

बुझते चिलमन को रोशन रहने

उस शमा का फिर भी इंतजार था

फिर भी इंतजार था